सर्जरी के दौरान मरीजों की नाक से निकाले गए ऊतक का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने इस कारण की खोज की है कि कोरोना (COVID-19) से संक्रमित होने के बाद लोग गंध सूंघने की अपनी क़ाबिलियत क्यों खो देते हैं, भले ही उन पर कोई अन्य लक्षण न दिखे।

Health News in Hindi - Why can't a corona-infected person Smell

Why can’t a corona-infected person Smell ?

अपने प्रयोगों में, उन्होंने महक के लिए जिम्मेदार नाक के क्षेत्र में एंजियोटेंसिन-परिवर्तित एंजाइम द्वितीय (एसीई-2) के उच्च स्तर पाए। एसीई-2 के उच्च स्तर के कारण ही कोरोना वायरस से संक्रमित रोगी अपनी सूँघने की क़ाबिलियत खो देता है। इस एंजाइम को एंट्री पॉइंट माना जाता है, जिससे कोरोना वायरस शरीर की कोशिकाओं में प्रवेश करता है और संक्रमण का कारण बनता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यूरोपीय रेस्पिरेटरी जर्नल में प्रकाशित उनके निष्कर्ष, इस बात का सबूत देते हैं कि COVID-19 इतना संक्रामक क्यों है? शरीर के इस हिस्से को लक्षित करना संभवतः कोरोना का अधिक प्रभावी उपचार प्रदान कर सकता है।

यह रिसर्च राइनोलॉजी और स्कल बेस सर्जरी के निदेशक प्रोफेसर एंड्रयू पी लेन, डॉ मेंगफी चेन अनुसंधान सहयोगी और जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन, बाल्टीमोर, यूएसए के सहयोगियों द्वारा किया गया था।

प्रोफेसर लेन ने कहा – मैं नाक और साइनस की समस्याओं का विशेषज्ञ हूं, इसलिए COVID-19 में गंध सूँघने की क्षमता का ग़ायब होना मेरे लिए एक क्लिनिकल इंटरेस्ट है। अन्य श्वसन वायरस आमतौर पर नाक के मार्ग की सूजन के कारण वायुप्रवाह में बाधा के माध्यम से गंध सूँघने की क्षमता का नुकसान करते हैं, लेकिन covid-19 वायरस में नाक में ऐसा कोई लक्षण नही होता है।

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रिसर्च टीम ने 23 ऐसे रोगियों के नाक के पीछे से ऊतक के नमूनों लिए जिनको ट्यूमर या क्रोनिक राइनोसिनिटिस, साइनस की बीमारी जैसी स्थितियों के लिए एंडोस्कोपिक सर्जिकल प्रक्रियाओं के दौरान हटा दिया गया था। उन्होंने सात रोगियों के ट्रेकिआ (विंडपाइप) से बायोप्सी का भी अध्ययन किया। कोई भी मरीज में कोरोना वायरस से संक्रमित नहीं था।

प्रयोगशाला में, शोधकर्ताओं ने एक माइक्रोस्कोप के द्वारा ACE2 की उपस्थिति का पता लगाने के लिए ऊतक के नमूनों पर फ्लोरोसेंट रंजक का उपयोग किया और विभिन्न सेल प्रकारों, नाक और ऊपरी वायुमार्ग के कुछ हिस्सों में ACE2 के स्तरों की तुलना की।

वे घ्राण उपकला (Olfactory Epithelium) की अस्तर कोशिकाओं पर (नाक के पीछे का क्षेत्र जहां से बदबू आती है) अब तक सबसे अधिक ACE2 पाया। इन कोशिकाओं में ACE2 का स्तर नाक और श्वासनली में अन्य ऊतकों की तुलना में 200 से 700 गुना (यहाँ परसेंट की बात नही की जा रही बल्कि कई गुना) अधिक था और उन्होंने घ्राण उपकला (Olfactory Epithelium) के सभी नमूनों में समान रूप से उच्च स्तर पाया, चाहे रोगी को पुराने राइनोसिनिटिस के कारण इलाज किया गया था या नहीं।

डॉ चेन ने कहा – इस तकनीक से हमें यह पता चला कि ACE2, COVID-19 प्रवेश बिंदु पर प्रोटीन का स्तर नाक के उस हिस्से में सबसे अधिक था जो हमें सूंघने में सक्षम बनाता है। इन परिणामों से पता चलता है कि नाक का यह क्षेत्र वह हो सकता है जहां से कोरोनो वायरस शरीर में प्रवेश करता है।

घ्राण उपकला (olfactory epithelium) शरीर में वायरस तक पहुंचने के लिए काफी आसान हिस्सा है।

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इस रिसर्च का एक परिणाम ये भी निकला की ACE2 के बहुत ही उच्च स्तर जो घ्राण उपकला (olfactory epithelium) पर मिले, उसी का उपयोग करके Covid-19 को आसानी से पकडा जा सकता है।

प्रोफेसर लेन ने कहा – अब हम प्रयोगशाला में यह देखने के लिए अधिक प्रयोग कर रहे हैं कि क्या वायरस वास्तव में इन कोशिकाओं का उपयोग शरीर तक पहुँचने और संक्रमित करने के लिए कर रहा है। अगर ऐसा है, तो हम सीधे नाक के माध्यम से दिए जाने वाले एंटीवायरल थेरेपी से संक्रमण से निपटने में सक्षम हो सकते हैं।

टोबीस वेल्टे जो अनुसंधान में शामिल नहीं थे, यूरोपीय रेस्पिरेटरी सोसाइटी पास्ट प्रेसिडेंट, पल्मोनरी मेडिसिन के प्रोफेसर और जर्मनी के हनोवर यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में पल्मोनरी एंड इन्फेक्शियस डिसीज विभाग के निदेशक हैं।

उन्होंने कहा – हम जानते हैं कि कई सामान्य श्वसन संक्रमण जैसे कि खांसी और जुकाम, हमें एक अवरुद्ध नाक या गले में खराश के साथ-साथ हमारी गंध सूँघने की क्षमता को अस्थायी रूप से खो सकते हैं। पिछले शोध से पता चला है कि Covid-19 संक्रमित रोगी में गंध सूँघने की क्षमता खो जाती है, यह एक सामान्य लक्षण है।

यह रिसर्च बताता है कि गंध के लिए जिम्मेदार हमारी नाक का हिस्सा वह स्थान भी हो सकता है, जहां से कोरोनो वायरस इंसानी शरीर में पैर जमाता है। इस रिसर्च को अभी और करने की आवश्यकता होगी, लेकिन यह संक्रमण के इलाज के लिए नए रास्ते प्रदान कर सकता है।

इस अध्ययन में भाग लेने वाले अन्य शोधकर्ताओं में वेनजुआन शेन, निकोलस आर रोवन हीथर कुलागा, अलेक्जेंडर हिलेल और मुरुगप्पन रामनाथन जूनियर शामिल हैं।

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